प्राकृतिक वनस्पति क्या है? प्राकृतिक वनस्पति का महत्व

इस artical के माध्यम से हमने प्राकृतिक वनस्पति क्या है? Praakrtik vanaspati kya hai, प्राकृतिक वनस्पति का महत्व। पृथ्वी पर कई प्रकार के प्राकृतिक वनस्पति है जिसके गुणों को मनुष्य अभी तक पता नहीं लगा पाया है। आज भी पृथ्वी ऐसे ऐसे प्राकृतिक वनस्पति Praakrtik vanaspati मौजूद है ओषधियों के दृष्टि से उनका काफी महत्व है।

प्राकृतिक वनस्पति किसे कहते हैं?Praakrtik vanaspati kya hai

प्राकृतिक वनस्पति विभिन्न पर्यावरणीय एवं प्राकृतिक पारितंत्रीय परिवेश में जो कुछ भी प्राकृतिक रूप में उगता है, उसे प्राकृतिक वनस्पति Praakrtik vanaspati कहते हैं। प्राकृतिक वनस्पति पौधों का वह समुदाय है, जिसमें लम्बे समय तक किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं हुआ है।

प्राकृतिक वनस्पति पर्वतीय क्षेत्र, मरुस्थल तथा डेल्टाई भागों में, जहाँ मनुष्य का हस्तक्षेप नहीं होता, उन भागों में पाई जा सकती है।

Praakrtik vanaspati kya hai
Praakrtik vanaspati kya hai

 

भारत की वनस्पति में विविधता 

प्राकृतिक वनस्पति और जलवायु की दशाओं और मृदा का बहुत ही निकट का संबंध है। भारत में क्योंकि ताप, वर्षा, मृदा विभिन्न स्थानों पर विभिन्न प्रकार की पाई जाती है, इसलिये यहाँ वनस्पति में इतनी विभिन्नता पाई जाती है। हिमालय की ऊँचाई पर शीतोष्ण वनस्पति पाई जाती है जबकि अण्डमान व निकोबार में उष्ण कटिबन्धीय वनस्पति पाई जाती है।

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वनस्पति एवं वन में अंतर

वनस्पति– वनस्पति शब्द का संकेत पेड़-पौधों की विभिन्न जातियों के समुच्चय की ओर होता है जो किसी विशिष्ट पर्यावरणिक वनस्पति या पारिस्थितिक ढांचे में एक-दूसरे के साहचर्य संबंध में पाया जाता है।

वन– वन शब्द का प्रयोग लोगों या प्रशासकों द्वारा पेड़-पौधों एवं झाड़ियों से आच्छादित बड़े क्षेत्रों के लिए किया जाता है।

भारत में प्राकृतिक वनस्पति के प्रकार|praakrtik vanaspati ke prakaar

Praakrtik vanaspati-एक विस्तृत देश होने के कारण यहाँ पर वनस्पति को प्रभावित करने वाले भौगोलिक, वनस्पति तथा जलवायु संबंधी तत्व मिलते हैं जिनका प्रत्यक्ष प्रभाव भारत की वनस्पति के वितरण एवं उनकी किस्म पर दिखाई पड़ता है। यही कारण है कि यहाँ पर उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों की वनस्पति से लेकर शीतोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों तक की वनस्पति मिलती है। भारत में अक्षांशीय तथा देशांतरीय विस्तार के कारण वनस्पतियों में भिन्नता पाई जाती है।

सामान्यतया उनके प्रकार, उनकी संरचना, जलवायु के तत्वों एवं वृक्षों की प्रकृति के आधार पर भारतीय वनस्पति को निम्नलिखित मुख्य वर्गों में विभाजित किया गया है

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1. उष्ण कटिबन्धीय सदाहरित वन तथा अर्ध-सदाहरित वन

2. उष्ण कटिबन्धीय पर्णपाती वन

3. कांटेदार वन

4.पर्वतीय वन

5. ज्वारीय वन

1. उष्ण कटिबन्धीय सदाहरित वन तथा अर्ध-सदाहरित वन 

उष्ण कटिबन्धीय सदाहरित वन अधिकतम वर्षा वाले भागों में पाये जाते हैं। ये पश्चिमी घाट, उत्तरी-पूर्वी पहाड़ियों तथा अण्डमान और निकोबार द्वीप समूह असम, मेघालय, नागालैण्ड, मिजोरम, त्रिपुरा में पाये जाते हैं। ये वृक्ष लंबे होते हैं। कभी-कभी 60 मी. तक लंबे हो जाते हैं। इन वनों में सूर्य का प्रकाश कठिनाई से पहुंच पाता है। भारत में इन वनों का क्षेत्रफल लगभग 46 लाख हेक्टेयर है।वन कुछ कम वर्षा वाले भागों में पाये जाते हैं। इनमें सिडार, कैल आदि वृक्ष होते हैं। इनमें महोगनी, रोजवुड, इबोनी, तून, पादूटूक, रबड़ इत्यादि हैं। इन वनों का महत्त्व बहुत बढ़ गया है, क्योंकि इनके वृक्षों का उपयोग बेटियाँ, पैकिंग तथा प्लाईवुड के लिए किया जाता है।

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2. उष्ण कटिबन्धीय पर्णपाती

ये मानसूनी प्रदेश के विशिष्ट वन हैं, इसीलिए इन्हें मानसूनी वन भी कहा जाता है। ये शिवालिक श्रेणी से लेकर पश्चिमी घाट के पूर्वीय ढलान तक फैले हैं। इस क्षेत्र में वर्षा 100 सेमी. से 200 सेमी. तक पाई जाती है। शुष्क मौसम के कारण ग्रीष्म ऋतु में लगभग 6 से 8 सप्ताह तक अपनी पत्तियाँ गिरा देते हैं। ये वन दो प्रकार के होते हैं

(i) आर्द्र पर्णपाती वन 

आर्द्र पर्णपाती वन उत्तर में शिवालिक श्रेणी के सहारे भावर और तराई के गिरिपाद मैदान, छोटा नागपुर, दक्कन के पठार के उत्तर-पूर्वी भाग और पश्चिमी घाट के पूर्व में उच्च-दक्षिण संकीर्ण पट्टी में फैले हुए हैं।

(ii) शुष्क पर्णपाती वन। 

 शेष क्षेत्रफल में शुष्क पर्णपाती वन फैले हैं। सागौन और साखू इन वनों के सबसे महत्त्वपूर्ण वृक्ष हैं। सागौन पश्चिमी घाट का प्रमुख वृक्ष है और साखू मुख्यतः भारतीय प्रायद्वीप के उत्तरी-पूर्वी भाग और शिवालिक तथा तराई क्षेत्रों का प्रमुख वृक्ष है। चंदन, रोजवुड, आबनूस, शीशम, महुआ अधिक महत्त्व के अन्य वृक्ष हैं।

3. काँटेदार वन

जहाँ 50 से.मी. से वर्षा कम होती है उन क्षेत्रों में ये वन पाये जाते हैं। इस प्रकार के वनों में न तो विभिन्न प्रकार के वृक्ष ही मिलते हैं और न ही वृक्षों की ऊँचाई अधिक होती है। इस प्रकार के वन या तो कृषि कार्य के लिए साफ कर दिए गए हैं या अत्यधिक पशु-चारण या आग के कारण नष्ट हो गए हैं, क्योंकि इनके समीपवर्ती भागों में जनसंख्या के अधिक केन्द्र हैं। ये वन विशेषकर राजस्थान, दक्षिणी-पश्चिमी पंजाब, हरियाणा, आंध्र प्रदेश, गुजरात तथा महाराष्ट्र में मिलते हैं, जिनमें मुख्य वृक्ष खजूर, बबूल, खैर, कीकर तथा बाँस हैं।Praakrtik vanaspati kya hai

4. पर्वतीय वनस्पति

पर्वतीय ढालों पर जहाँ तापमान बढ़ने लगता है उन क्षेत्रों में ये वन पाये जाते हैं। पर्वतीय वनों को उत्तरी पर्वतीय वन तथा दक्षिण पर्वतीय वन में विभाजित किया जा सकता है। ऊँचाई के अनुसार यहाँ भिन्न-भिन्न प्रकार के वृक्ष मिलते हैं।

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5. ज्वारीय अथवा दलदली वन

इन्हें मेनग्रूव (Mangrove) अथवा ज्वारीय (Tidal) भी कहते हैं। ये वन गंगा-ब्रह्मपुत्र, महानदी, गोदावरी, कृष्णा कावेरी आदि नदियों के डेल्टाओं में उगते है। इस कारण इन्हें डेल्टाई वन कहते है। सबसे महत्वपूर्ण गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा का सुंदरवन है। इसमें ‘सुन्दरी’ नामक वृक्ष की बहुलता है। इसलिए इसे सुन्दरवन कहते है।

Praakrtik vanaspati kya hai
Praakrtik vanaspati kya hai

 

भारत में वन क्षेत्र

 देश का 6,78,333 वर्ग कि०मी० क्षेत्र वन क्षेत्र है। जो कुल भौगोलिक क्षेत्र का 20.64 प्रतिशत है। यह ध्यान देने योग्य है कि वन क्षेत्र तथा वास्तविक वन क्षेत्र में अन्तर है। वन क्षेत्र वह है जो वन भूमि के लिये है जबकि वास्तविक वन क्षेत्र वह है जो वनों द्वारा घेरा हुआ है।वन क्षेत्र तथा वास्तविक वन क्षेत्र दोनों ही राज्य से राज्य में भिन्न हैं। लक्षद्वीप में शून्य वन क्षेत्र है जबकि अण्डमान और निकोबार में यह 88.93% भूमि पर है।

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मानव जीवन में वनों का महत्व

मानव जाति के दैनिक जीवन में वनों के अनेक उपयोग हैं। वनों से इमारती लकड़ी, फल-फूल,जड़ी-बूटियाँ आदि प्राप्त होती हैं। समस्त मानव जाति के दैनिक जीवन में स्कूल-कॉलेज, अस्पताल, घर, रेलवे लाइन आदि में वनों का उपयोग है। वन वर्षा को आकर्षित करते हैं और पर्यावरण प्रदूषण से सुरक्षा प्रदान करते हैं। वनों से मिलने वाले लाभ इस प्रकार है

1. प्रत्यक्ष लाभ (direct Advantages)

(i) वनों से अनेक उद्योगों के लिए कच्चा माल प्राप्त होता है।

(ii) वनों से लाख, तारपीन का तेल तथा मोम प्राप्त होता है। 

(iii) वनों से अनेक प्रकार की जड़ी-बूटियाँ मिलती हैं। 

(iv) वनों से ईंधन के लिए लकड़ी प्राप्त होती है।

(v) वनों से अनेक लोगों को रोजगार मिलता है। 

(vi) वनों से काफी घास मिलती है। अत: वहाँ पशु चराए जाते हैं।

2. अप्रत्यक्ष लाभ (Indirect Advantages)

(i) वन भूमि के कटाव को रोकते हैं। 

(ii) वन प्राकृतिक संतुलन बनाये रखते हैं।

(iii) वन प्राकृतिक सुंदरता में वृद्धि करते हैं। 

(iv) वन प्राकृतिक पर्यावरण को सुंदर बनाते हैं।

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Conclusion

Praakrtik vanaspati kya hai तो प्रिय पाठक अब आपको इस चीज का ज्ञान हो गया होगा की प्राकृतिक वनस्पति किसे कहते हैं?,भारत की वनस्पति में विविधता,वनस्पति एवं वन में अंतर,भारत में प्राकृतिक वनस्पति के प्रकार,मानव जीवन में वनों का महत्व, के बारे में जानकारी मिली है। 

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